Målarbok Måla med Poppe -Färg är känslornas språk, säger Poppe. I den här målarboken finns 40 sidor med härliga bilder från Poppes alla sagoböcker. Barnen får måla men också fylla i olika känslouttryck i Poppes ansikte och lära sig om färgernas betydelse. Barnen får svara på frågor om vilken färg de upplever vid olika sorters känslor som till exempel glad-grön eller röd-arg. En trevlig present och bra komplement till övriga Poppe produkter. Målarboken har blankt glansigt omslag i färg och glitter på stjärnorna. Sadelhäftad Innehåller vita papper med svartvita målningar inuti.
Färglägg och lär dig Sveriges regenter från Gustav Vasa och framåt. Målarboken innehåller 20 illustrationer och är ett roligt och lättsamt sätt att lära sig landets kungar och drottningar. Målarboken är tryckt på återvunnet papper.
Ta fram kritor, pennor, penslar & släpp loss kreativiteten med Blubben och vännerna Blubbianerna i denna målarbok med breda linjer och några lite svårare sidor med tunnare linjer.
Charlotte Salomon är en person och konstnär med ett livsöde som förskräcker och berör. I Måla sitt liv skildras hennes liv och konstnärskap. Livsverket Liv eller teater? är unikt och föregångare till dagens autofiktiva seriebildromaner. Hon undersöker i konstverket de stora livsfrågorna. Samtidigt prövar hon olika konstformer och utvecklar sitt bildskapande till en helt egen profil. Liv eller teater? blir hennes väg att hantera och bearbeta sitt liv och familjens arv med många självmord, bland annat hennes egen mammas. Charlotte Salomon föddes i en judisk familj 1917, i Berlin. Hon och hennes familj utestängs och avskedas från utbildning och arbete. De förföljs och interneras. Hon flyr till sina morföräldrar i Nice och staden blir under några år en fristad för henne. Efter krigsutbrottet 1939 blev det mer hotfullt även i Nice. Ur sitt kaos av personliga erfarenheter och minnen bygger hon ett drama som hon färdigställer innan hon grips av Gestapo. Hon mördades i Auschwitz i oktober 1943. Maria Modigs Måla sitt liv är den första boken på svenska om detta unika konstnärskap.
भले ही हम कंप्यूटर युग में पहुंच गए हों और विकास के नये कीर्तिमान स्थापित कर रहे हों पर जहां तक एक स्वस्थ समाज की बात आती है तो स्त्रियों के खिलाफ लगातार हो रहे अत्याचार और अपराध हमें आदिम युग की याद दिलाते हैं। समाज में स्त्रियों को उपभोक्ता की वस्तु समझा जाता है। उसका उपभोग करने की प्रवृत्ति हर जगह देखने को मिलती है। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध का मुख्य कारण कन्या भ्रूण हत्या की घटनाओं में होने वाली बढ़ोत्तरी है।लेखक ने स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अत्याचार और अपराध की सच्ची घटनाओं को आधार बनाकर अध्ययन किया है। समाज में स्त्री और पुरुषों के रहन-सहन, उनकी शिक्षा, अभिभावकों का व्यवहार, स्त्रियों के साथ होने वाले अत्याचार के समय लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में इस पुस्तक में सजीव चित्रण है। लेखक स्त्रियों को बेहतर और सफल जीवन के लिए उपयुक्त सुझाव भी देता है। उसका उद्देश्य स्पष्ट है कि हमारे समाज में स्त्रियां निर्भय होकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सके। अपना मनोबल ऊंचा उठाते हुए अपने खिलाफ होने वाले अत्याचार और अपराधों का बखूबी सामना कर सके। साथ ही इस समाज में निडर होकर सम्मान के साथ जी सकें।
हिंदी साहित्य के व्यंग्य लेखन की विधा मुझे प्रारंभ से ही बड़ी लुभाती रही। करीब-करीब सारे व्यंग्य लेखकों को पढ़ने और उनसे सीखने का सौभाग्य मिला। व्यंग्य लेखन में गंभीर विषयों पर चुटीले अंदाज में प्रतीकात्मक और परोक्ष रूप से अपनी बातें रखकर सरल तरीके से पाठकों तक पहुँचाया जाता है। अपनी रचनाओं में लेखकों का यह कतई उद्देश्य नहीं होता कि किसी की भावना को ठेस पहुँचाई जाए अथवा नकारात्मक बातों को प्रेषित किया जाए। मैंने भी व्यंग्य लेखन के क्रम में ईमानदारी से इस मर्यादा को पालन करने का प्रयास किया है। लेखन का एकमात्र उद्देश्य यह है कि नकारात्मकता को भी सकारात्मकता के साथ प्रस्तुत कर समाज को सजग और सचेत किया जाए। इन्हीं शुद्ध भावों के साथ अपनी इक्यावन रचनाओं के संकलन के साथ आपके समक्ष सेवाभाव से उपस्थित हूँ। पुलिस सेवा में रहने के कारण समाज को, व्यक्तियों, परिस्थितियों, घटनाओं, शासन की व्यवस्थाओं को काफी निकट से देखने-समझने का अनुभव और सौभाग्य प्राप्त हुआ। जिन-जिन तथ्यों एवं परिस्थितियों ने मुझे संवेदित किया, उन्हें अपनी रचनाओं में विभिन्न प्रकार से समायोजित करने का प्रयास मैंने किया है। इस पुस्तक के माध्यम से आप पाठक ही यह निर्णय कर पाएँगे कि मैं इसमें कितना सफल हुआ। -प्रशांत करण
This book has been considered by academicians and scholars of great significance and value to literature. This forms a part of the knowledge base for future generations. We havent used any OCR or photocopy to produce this book. The whole book has been typeset again to produce it without any errors or poor pictures and errant marks.
In a world that moves at an ever-increasing pace, finding moments of stillness and self-reflection can seem like a luxury. This collection of writings invites you to pause and immerse yourself in the themes of healing and leading a slow life. Through personal stories and introspective reflections, the author explores the journey of self-discovery, the power of nature, and the profound impact of solitude. Inspired by the gentle strength of the Greek goddess Maia and the transformative concept of Maya in Indian philosophy, these pieces offer a sanctuary for the soul. Whether you are seeking comfort, inspiration, or a deeper connection with yourself, this book provides a heartfelt guide to embracing the beauty of a slower, more intentional life.
भारत के चौतरफा विकास की गाथा लिखने के क्रम में आधी आबादी के योगदान को कतई नकारा नहीं जा सकता। देश में महिला सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय नीति (2001) बनाए जाने के बाद उनके कदम सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्र में सुदृढ़ संकल्प के साथ उठे जरूर, लेकिन उन्हें बीते एक दशक में जो कुछ हासिल हुआ वह केंद्र और राज्य सरकारों से मिली हर स्तर की नीतिगत कार्य योजनाएं, निर्धारित लक्ष्य, उद्देश्य, सुरक्षा, सुविधाएं, सहूलियतें और विशेष सम्मान की बदौलत ही संभव हो पाया। इस दौरान केंद्र सरकार द्वारा संचालित कार्य-नीति से हर वर्ग की महिलाओं को मिलने वाला लाभबेमिसाल साबित हुआ, जिससे उनका न केवल जीवन स्तर और रहन-सहन में व्यापक सुधार आया, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक दायित्व के प्रति उनका नजरिया ही बदल गया और खुद को बेहतर बनाने से लेकर हर क्षेत्र में ऊंची उड़ान भरने तक की अनगिनत मिसालें बनाती चली गई... उनमें जिस तरह आत्मसम्मान के साथ आत्मविश्वास की भावना भर गई है, वह भारत में महिला सशक्तिकरण की पुष्टि करता है...
चार दर्जन पुस्तकों के लेखक डॉ. राकेश कुमार आर्य का जन्म 17 जुलाई, 1967 को ग्राम महावड़ जनपद गौतमबुद्ध नगर उत्तर प्रदेश में एक आर्य समाजी परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम महाशय राजेंद्र सिंह आर्य और माता का नाम श्रीमती सत्यवती आर्या है। विधि व्यवसायी होने के साथ-साथ श्री आर्य एक प्रखर वक्ता भी हैं।श्री आर्य को उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह द्वारा विशेष रूप से 22 जुलाई, 2015 को राजभवन राजस्थान में सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से 12 मार्च, 2019 को केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा उनकी शोध कृति "भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास" को वर्ष 2017 के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।इतिहास संबंधी शोधपूर्ण कार्य पर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय आर्य विद्यापीठ के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉक्टर श्यामसिंह शशि और संस्कृत में प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता प्रोफेसर डॉक्टर सत्यव्रत शास्त्री विद्वानों के द्वारा डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि विगत 17 जुलाई, 2019 को उनके 53वें जन्म दिवस के अवसर पर दिल्ली में होटल अमलतास इंटरनेशनल में प्रदान की गई।श्री आर्य को उनके उत्कृष्ट लेखन कार्य के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों व सामाजिक संस्थाओं से भी सम्मानित किया गया है। मेरठ के चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय सहित कई विश्वविद्यालयों में उनके लेक्चर विजिटर प्रोफेसर के रूप में आयोजित किए गए हैं।