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542 tulosta hakusanalla Meri Mort
हिन्दी साहित्य में 'नयी कहानी आन्दोलन' के बाद उभरे लेखकों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले लेखक रवीन्द्र कालिया की कहानियों की मौलिक विशेषता है युवा जीवन की संवेदनाओं का रेखांकन। उनकी कहानियों में हमारे शहरों-कस्बों की ज़िन्दगी में आ गयी जकड़बन्दी और दमघोंटू वातावरण का सजीव चित्रण है जो पाठकों को यथास्थिति से टकराने का हौंसला देता है। विधा के स्तर पर भी वे प्रयोगशील हैं और सामान्य कहानियों के साथ लम्बी कहानी का सधा हुआ कौशल भी उनके यहाँ दिखाई देता है। वे अपने लेखन में किसी शैली या भंगिमा को स्थायी नहीं बनने देते बल्कि लगातार नया-अलहदा और भिन्न रचने की तड़प उन्हें अपनी पीढ़ी में आदर्श कथाकार होने की वजह देती है। इन कहानियों का चुनाव स्वयं रवीन्द्र कालिया ने किया था और 2016 में उनके असामयिक निधन के बाद उनकी पत्नी ममता कालिया इन्हें पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रही हैं।
हिन्दी के समकालीन कथाकारों में वरिष्ठ ममता कालिया का लेखन नया और ताजगी भरा लगता है क्योंकि वे अपने आप को लगातार पुनर्नवा करती रही हैं। नब्बे के दशक में आये स्त्री विमर्श की नयी उत्तेजना के बहुत पहले उन्होंने 'आपकी छोटी लड़की' जैसी कहानी लिखी थी तो बिलकुल इधर के सामाजिक संक्रमण का राष्ट्रीय रूपक 'दल्ली' में देखा जा सकता है। ममता कालिया की भाषा की बहुत प्रशंसा हुई है। ब्रज की मिठास हो या इलाहाबाद का अवधी रंग - इस भाषा ने फिर साबित किया है कि सीधी लकीर खींचना सचमुच टेढ़ा काम है। हिन्दी कहानी को ऊँचाई देने वाली इस कथाकार की अपनी प्रिय कहानियों का यह संग्रह पाठकों को प्रिय होगा इसमें संदेह नहीं।
सुदूर वेस्ट गारो हिल्स में जनमे पी.ए. संगमा सन् 1996 में लोकसभा के स्पीकर बने-ऐसा बननेवाले विपक्ष के पहले सदस्य थे। यह निश्चित रूप से भारतीय लोकतंत्र की जीत है। 'मेरी राजनीतिक जीवन यात्रा' भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की सबसे आकर्षक हस्तियों में से एक के राजनीतिक जीवन को दिखाती है। यह एक छोटे से जनजातीय गाँव से देश की संसद् के सर्वोच्च स्तर तक उनके उदय पर नजर डालती है, जिसमें भारतीय राजनीति और विकास में उनके योगदानों के साथ ही, लोकतांत्रिक संस्थानों की रक्षा तथा जनसाधारण के कल्याण के लिए उनके निरंतर संघर्ष को बताया गया है। लोकसभा और राज्यसभा में संगमा ने जितने भी भाषण दिए, उनमें से महत्त्वपूर्ण भाषणों को इसमें शामिल किया गया है। इसके साथ ही लोकसभा अध्यक्ष के रूप में उनके आदेशों, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और सेमिनारों में दिए उनके भाषणों को भी शामिल किया गया है। भारत की स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष में संसद् के सेंट्रल हॉल में उनका मध्य रात्रि का भाषण भी इसका हिस्सा है। इन भाषणों में देश के विकास और भारत के नागरिकों के प्रति एक प्रतिष्ठित सांसद की सोच और चिंता झलकती है; साथ ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की कार्य प्रणाली का भी परिचय मिलता है। इस पुस्तक में जाने-माने नेताओं और विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों के संदेश भी हैं, जिनमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और मजदूर संघ के नेता शामिल हैं, जो संगमा के बहुआयामी व्यक्तित्व के विषय में बताते हैं। एक दूरदर्शी नेता के प्रति भावपूर्ण श्रद्धांजलि तथा युवा नेताओं, शोधकर्ताओं और सामान्य पाठकों के लिए भारतीय लोकतंत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर उपयोगी सामग्री व प्रकाश डालने वाली संग्रहणीय पुस्तक।
Meri Khaki, Meri Zindagi (Hindi Translation of Life in the Uniform)
Amit Lodha
Prabhat Prakashan
2022
nidottu
अमित लोढ़ा एक सम्मानित आई.पी.एस. अधिकारी हैं और अभी महानिरीक्षक के पद पर सुशोभित हैं। प्रशासनिक सेवा में शामिल होने एवं पदोन्नति से पूर्व वह आई.आई.टी. स्नातक थे और अपने जीवन के उद्देश्य की तलाश में थे। इस पुस्तक में लोढ़ा ने अपने जीवन में आए उल्लेखनीय बदलाव और यू.पी.एस.सी. परीक्षाओं की तैयारियों के विषय में अपने अनुभव, अपने संघर्ष और अपनी जिजीविषा के बारे में खुलकर चर्चा की है। साथ ही, अधिकारी बनने के लिए प्राप्त प्रशिक्षण का भी उल्लेख किया है; और बिहार में अपने कॅरियर की शुरुआत के सबसे यादगार पलों का भी। 'मेरी खाकी मेरी जि़ंदगी' की साहसिक कहानियों में लेखक के विनोदी स्वभाव की झलक दिखाई देगी और अपहरण के मामलों को सुलझाने से लेकर भीड़ को नियंत्रित करने की घटनाओं का भी वर्णन मिलेगा, जो उनकी कर्मशीलता, नेतृत्व क्षमता और कर्तव्यपरायणता का बोध कराएगा। एक पुलिस अधिकारी के जीवन की सच्ची घटनाओं पर आधारित यह पठनीय एवं भावपूर्ण पुस्तक आपको उनके संघर्ष, त्याग और सफलताओं का दिग्दर्शन कराएगी।
मेरी माई' विषय ही ऐसा है, जिस पर नजर पड़ते ही हर व्यक्ति के दिलो-दिमाग में अपनी माँ की तस्वीर उभर आएगी, न चाहते हुए भी वह इसे पढ़ना चाहेगा। इसीलिए इस अमूल्य कृति में माँ और सिर्फ माँ की तस्वीर उभारने की कोशिश की गई है, क्योंकि इस ब्रह्मांड में एक माँ ही है, जिसका अस्तित्व था, है और हमेशा बरकरार रहेगा। माँ है तो सृष्टि है।
राहुल पंडिता जब महज 14 वर्ष के थे तो उन्हें अपने परिवार सहित श्रीनगर से पलायन करना पड़ा था। वे मुस्लिम बहुल कश्मीर में हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय के कश्मीरी पंडित थे, जहाँ अस्सी के दशक के आखिर में भारत से 'आजादी' को लेकर लगातार उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। 'मेरी माँ के बाईस कमरे' कश्मीर के दिल से निकली वह कहानी है, जिसमें इस्लामी उग्रवाद के कारण लाखों कश्मीरी पंडितों के उत्पीडऩ, हत्याओं और पलायन का दर्द छुपा है। यह एक ऐसी आपबीती है, जिसमें एक पूरा समुदाय बेघरबार होकर अपने ही देश में निर्वासितों का जीवन जीने को मजबूर हो जाता है। राहुल पंडिता की यह कहानी झकझोर कर रख देनेवाली है और इसे बार-बार कहा जाना जरूरी है, ताकि हम इतिहास से सबक ले सकें।