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1000 tulosta hakusanalla Rahul Sankrityayan

Meri Tibbat Yatra

Meri Tibbat Yatra

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2023
nidottu
यह हिंदी व्याकरण काशी नागरीप्रचारिणी सभा के अनुरोध और उत्तेजन से लिखा गया है। सभा ने लगभग पाँच वर्ष पूर्व हिंदी का एक सर्वागपूर्ण व्याकरण लिखने का विचार कर इस विषय के दो-तीन ग्रंथ लिखवाए थे, जिनमें बाबू गंगाप्रसाद एम. ए. और पं. रामकर्ण शर्मा के लिखे हुए व्याकरण अधिकांश में उपयोगी निकले। तब सभा ने इन ग्रंथों के आधार पर अथवा स्वतन्त्र रीति से, विस्तृत हिंदी व्याकरण लिखने का गुरुभार मुझे सौंप दिया। इस विषय में पं. महावीरप्रसाद जी द्विवेदी और पं. माधवराव सप्रे ने भी सभा से अनुरोध किया था, जिसके लिए मैं आप दोनों महाशयों का कृतज्ञ हूँ। मैंने इस कार्य में किसी विद्वान् को आगे बढ़ते हुए न देखकर अपनी अल्पज्ञता का कुछ भी विचार न किया और सभा का दिया हुआ भार धन्यवादपूर्वक तथा कर्तव्यबुद्धि से ग्रहण कर लिया। उस भार को अब मैं पाँच वर्ष के पश्चात्, इस पुस्तक के रूप में यह कहकर सभा को लौटाता हूँ कि- 'अर्पित है, गोविन्द, तुम्हीं को वस्तु तुम्हारी।'
Divodas  (Edition1st)

Divodas (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
अपने जन को सब तरह से सुखी और समृद्ध बनाने का निश्चय दिवोदास ने कर लिया था। अपने परिवार के लिए उसे चिन्ता नहीं थी। पिता द्वारा अर्जित पशु और धन उसके पास पर्याप्त था। अपनी स्वाभाविक रुचि तथा ऋषि की शिक्षा के कारण उसमें कोई व्यसन नहीं था। सरल, परिश्रमी जीवन उसे पसन्द था। पर, जब तक सारा जन कष्ट से मुक्त न हो, तब तक वह कैसे चैन ले सकता था? विपाश (व्यास), शतद्रु और परुष्णी के बीच की अपनी जन्मभूमि में वह केवल अपने पशुओं के साथ विचरण नहीं करता था, बल्कि अपने लोगों को समीप देखने, उनके साथ घनिष्ठता स्थापित करने के लिए भी ऐसा करते समय एक बार उसका ग्राम (समूह) परुष्णी (रावी) के किनारे बहुत उत्तर में पड़ा हुआ था। राजा का कर्तव्य था, लोगों के पारस्परिक झगड़े को दूर करना
Kanaila ki katha  (Edition1st)

Kanaila ki katha (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में कदम रखते जान पड़ता है, कनैला अब पिछड़े इलाके का गाँव नहीं रह जाएगा। आजमगढ़ से एक नई पक्की सड़क कनैला तक पहुँच गई है जो सिसवा (शिंशपापुरी) में मैंगई के पुल को पार कर आगे तक जा रही है। कनैला में रिक्शा आने लगा है और लारी भी। हो सकता है, कुछ ही वर्षों में वहाँ से बस में बैठकर चार-छह घंटे में वाराणसी पहुँचा जा सके। इसे देखकर सिसवा के पुराने भाग्य के लौटने की कल्पना मन में उठने लगती है। पर, यह दूर की बात है। डीहा में हाई स्कूल चल रहा है। जहाँ इस शताब्दी के आरम्भ में स्कूल का भी पता नहीं था। यदि कनैला वालों ने अदूरदर्शिता का परिचय न दिया होता, तो वह हाई स्कूल कनैला में वहीं बनने जा रहा था जहाँ से कि हाल में पक्की सड़क निकली है। दो-चार एकड़ परती जमीन दे देने में कनैला वालों को बहुत नुकसान भी नहीं उठाना पड़ता। डीहा होकर एक दूसरी सड़क पश्चिम से पूर्व की ओर नप गई है। इस प्रकार यातायात के साधन सभी वहाँ मौजूद हो रहे हैं। तो भी अभी कनैला की ऊख के किसी मिल में जाने का सुभीता नहीं है। लोग अपनी जरूरत के गुड़ और खाँड़ के लिए ऊख बोते हैं जिसमें कुछ गुड़ बिक भी जाता है। रामचन्दर पण्डित ने ऊख बोने के लिए अपने खेत में पानी दिया। बोई जाने वाली ऊख को काटकर रात भर पानी में भिगो दिया। सबेरे ऊख बोने का समय आया। हलवाहे को बुलाने गये। उसने आने से इन्कार कर दिया।
Anath  (Edition1st)

Anath (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
कुछ क्षण बाद मुँह का स्वाद फिर पहले जैसा हुआ, लेकिन भूख अँतड़ियों को काटने लगी। उसने लकड़ी लेकर जमीन को खोदा और मिट्टी के नीचे से पतली जड़ निकाल कर चबाना शुरू किया, पर यह भी कड़वी और दुःस्वादु थी, तो भी चबाते वक्त उससे रस निकला, जिसके भीतर जाने से अनाथ का चित्त कुछ तुष्ट हुआ। वह आँखों को दबाकर चेहरे पर सिकुड़न डाले हुए चबाई हुई जड़ को जोर लगाकर निगल गया। मन खराब नहीं हुआ और जड़ ने जाकर पेट में स्थान लिया। अनाथ की हिम्मत बढ़ी और उसने और भी कितनी ही जड़ों को खोदकर खाया। पेट को कुछ आराम मिला। उसको भी कुछ हिम्मत हुई। इस तरह वह फिर आगे रवाना हुआ। आज अनाथ ने कई बार जड़ और पानी से पेट को आराम दिया और शाम तक माँ की खोज करता रात में फिर एक गड्ढे में पड़ कर सो रहा। शाम को आसानी से नींद आयी, लेकिन रात को नींद उचट गयी। उसके पेट में दर्द होने लगा। उसने कै करना चाहा, लेकिन के में कुछ निकला नहीं। उसने पानी से बाहर पड़ी मछली की तरह रात बितायी। सूर्योदय के बाद वह फिर गड्ढे से निकला, लेकिन पेट के दर्द और पैर के फफोलों ने उसमें चलने की शक्ति नहीं रखी। फफोलों ने फूटकर पैर को घायल बना दिया था। अब उसके सामने दो ही रास्ते थे या तो उसी जगह पड़ा-पड़ा भाग्य पर विश्वास कर मरने की तैयारी करे, या दिल कड़ा करके रास्ते रास्ते करुणामयी माँ को ढूँढ़ने की कोशिश करे।
Teen Natak  (Edition1st)

Teen Natak (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
पंडित दुनिया में ई दुख-सुख सब पुरुबिला करम से हा। हमरा सर-कार एतना साधु- महतिमा, देवी देवता के सेवा-टहल दान-पुन्न करत बाड़ें, एकर फल ओनके आगे मिली। हमरा अमहरा के लखपती महाजन लोटनसाहु जे नौका ठकुरबाड़ी बनवलै हाँ, सदाबरत लगौले बाड़ें, एकर फल बाँव ना जाई। एहि जिनगी के पुन्न के फल भोग-सुख अगिला जनम में मिली नोहर पछिले जनम के कइल पुन्न के फल एहि बखत मिलि रहल बा। नोहर पुन्न के फल बाकी पंडित जी लोटन साहु लइकैंया अपना चाचा के साथ कपारे पा दौरी ध के तेल बेंचत रहलन। ओहि बखत पछिला जनम के पुन्न सहाइ ना भइल। दौरी- दूकान राखि के एक के डेढ़ा करै लगलै, गरीबन के कमाइल धन अपना घरे सहेटे लगलैं। फेनु सवाई सूद पर रुपया लगावे लगलें, तब जमा होये लागल। जेतना धन औ रुपया साहू के पाले बा, ऊ सब हमनी लेखाँ कमेरन के पेट काटि के जमा भइल बा।
Baisavi Sadi  (Edition1st)

Baisavi Sadi (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
सड़ा गला, खराब अन्न भी उस समय करोड़ों आदमियों को पेट भर न मिलता था। कितने ही लोग पेट के लिए गाँव-गाँव भीख माँगते फिरते थे। मैंने अपनी आँखों से अनेक स्थानों पर ऐसे लड़कों और आदमियों को देखा था, जो कि, फेंके जाते जूठे टुकड़ों को कुत्तों के मुँह से छीनकर खा जाते थे। यह बात नहीं, कि लोग परिश्रम से घबराते थे। दो-चार चाहे वैसे भी हों; किन्तु अधिकतर ऐसे थे, जो रात के चार बजे से फिर रात के आठ-आठ दस-दस बजे तक भूखे-प्यासे खेतों, दुकानों, कारखानों में काम करते थे, फिर भी उनके लिए पेट-भर अन्न और तन के लिए अत्यावश्यक मोटे-झोटे वस्त्र तक मुयस्सर न होते थे। बीमार पड़ जाने पर उनकी और आफ़त थी। एक तरफ बीमारी की मार, दूसरी ओर औषधि और वैद्य का अभाव और तिस पर खाने का कहीं ठिकाना न था। १९१८ के दिसम्बर का समय था, जबकि सिर्फ़ इन्फ्लुयेंजा की एक बीमारी में और सो भी ४-५ सप्ताह के अन्दर, ६० लाख आदमी भारतवर्ष में मर गये। मरनेवाले अधिकतर गरीब थे, जिनके पास न सर्दी से बचने के लिए कपड़ा था, न पथ्य के लिए अन्न, न दवा के लिए दाम था, न रहने के लिए साफ़ मकान, वह पशु-जीवन नहीं, नरक का जीवन था। आदमी कुत्ते-बिल्ली की मौत मरते थे। मुझे आज-कल की भाषा का बोध नहीं, अतः उसी पुरानी भाषा में ही बोल रहा हूँ। संभव है, आप लोगों को कहीं-कहीं समझने में कठिनाई हो।
Stalin : Ek Jeevani

Stalin : Ek Jeevani

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
दुनिया की अनेकों भाषाओं में स्तालिन की जीवनी या जीवनियों का अभाव नहीं, यद्यपि उनमें कितनी ही बातों की कमियाँ देखी जाती है। पर, हिन्दी में तो प्रायः उनका अभाव ही है। वैसे स्तालिन के ऐतिहासिक जीवन ही नहीं, बल्कि भावी संसार के पथ- प्रदर्शक के रूप के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करना भी एक उद्देश्य हो सकता था, जिसके कारण मुझे लेखनी उठानी पड़ती। मैं यह मानता हूँ कि इस जीवनी में भी एक त्रुटि दिखाई पड़ेगी, जो त्रुटि दूसरी भाषाओं की जीवनियों में भी देखी जाती है। वह है-वैयक्तिक जीवन की घटनाओं की कमी। मैं उनकी खोज में हूँ, लेकिन उनके प्राप्त करने तक पुस्तक लिखने या उसे प्रकाशित करने से रोके रखना, इसे अनिश्चित काल के लिये स्थगित करना होता। दूसरे संस्करण में, मुझे आशा है, उस दिशा में भी मैं कुछ और चीजें पाठकों को दे सकूँगा। स्तालिन का जीवन केवल ज्ञानवर्द्धन का साधन ही नहीं है, बल्कि वह पग-पग पर गहन कर्म-पथ पर प्रकाश डालता है।
Islam dharm ki rooprekha (Edition1st)

Islam dharm ki rooprekha (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
हिन्दू-धर्म में जैसे अनेक सम्प्रदाय तथा उनके सिद्धान्तों में परस्पर भेद है, वैसे ही 'इस्लाम' की भी अवस्था है। इन कठिनाइयों से बचने के लिए मैंने 'कुरान' के मूल को उन्हीं शब्दों में केवल भाषा के परिवर्तन के साथ 'इस्लाम धर्म' को रखने का प्रयत्न किया है। बहुत कम जगह आशय स्पष्ट करने के लिए कुछ और भी लिखा गया है। ग्रन्थ लिखने का प्रयोजन हिन्दुओं को अपने पड़ोसी मुसलमान भाइयों के धर्म की जानकारी कराना है, जिसके बिना दोनों ही जातियों में एक-दूसरे के विषय में अनेक भ्रम आये दिन उत्पन्न हो जाया करते हैं। यह उक्त अभिप्राय का कुछ भी अंश इससे पूर्ण हो सका तो मैं अपने श्रम को सफल समझूँगा।
Tumhari kshay  (Edition1st)

Tumhari kshay (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
एक तरफ़ प्रतिभाओं की इस तरह अवहेलना और दूसरी तरफ़ धनियों के गदहे लड़कों पर आधे दर्जन ट्यूटर लगा-लगाकर ठोक-पीटकर आगे बढ़ाना। मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जिसके दिमाग़ में सोलहों आने गोबर भरा हुआ था, लेकिन वह एक करोड़पति के घर पैदा हुआ था। उसके लिए मैट्रिक पास करना भी असम्भव था। लेकिन आज वह एम.ए. ही नहीं है, डॉक्टर है। उसके नाम से दर्जनों किताबें छपी हैं। दूर की दुनिया उसे बड़ा स्कॉलर समझती है। एक बार 'उसकी' एक किताब को एक सज्जन पढ़कर बोल उठे "मैंने इनकी अमुक किताब पढ़ी थी। उसकी अंग्रेज़ी बड़ी सुन्दर थी; और इस किताब की भाषा तो बड़ी रद्दी है?" उनको क्या मालूम था कि उस किताब का लेखक दूसरा था और इस किताब का दूसरा। प्रतिभाओं के गले पर इस प्रकार छूरी चलते देखकर जो समाज खिन्न नहीं होता, उस समाज की 'क्षय हो', इसको छोड़ और क्या कहा जा सकता है।
Jeene ke liye (Edition1st)

Jeene ke liye (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
""इतनी उम्मीद न थी। वादों को भूल जाने की ही बात नहीं, बल्कि यह उल्टी छुरी से गला रेतना है। क्या 'सत्य अहिंसा' का पालन इसी तरह होता है?"" हरनंदन ने कांग्रेसी मंत्रिमण्डल के सवा साल के कार्यों पर टिप्पणी करते हुए कहा। ""सत्य और अहिंसा क्या देख नहीं रहे हो. कैसी-कैसी सूरतें अब तिरंगे झंडे के नीचे खड़ी हो रही हैं?"" कमाल ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा- ""रायबहादुर केशव सिंह सरकारी वकील बनाए गए हैं।"" ""अजी जनाब, अमन सभा की सेवाओं का भी तो सरकार को ख़याल करना चाहिए था। कितने पुराने दोस्तों और साथियों को जेल का रास्ता दिखलाने के लिए कुछ पारितोषिक मिलना चाहिए।"" बटुक ने बालों को पीछे की ओर सहलाते हुए कहा। ""भाई यह गद्दी का महातम है, जो उस पर बैठता है. वह ऐसा ही हो जाता है।"" ""नहीं साथी रामप्रसाद घबड़ाने की बात नहीं. इस अवस्था से भी पार होना पड़ता है।"" ""आख़िर खरे-खोटे की परख कैसे होगी?""-निर्मल ने कहा। ""सो तो ठीक है, निर्मल, लेकिन देख-देखकर कुफ्त होती है। जो मूर्तियाँ आज झंडे के नीचे इकट्ठा हो रही हैं, वह हृदय परिवर्तित करके नहीं आई हैं, इसीलिए नहीं कि 'झंडा ऊँचा रहे हमारा'। आज कांग्रेस में कैसी गन्दगी है। ऐसे-ऐसे लोगों ने खद्दर पहनना शुरू किया है और ऐसे अभिप्राय से कि 'लम्बा टीका मधुरी बानी दगाबाज की यही निशानी' याद आती है। आखिर हम जा कहाँ रहे हैं?"" - इसी पुस्तक से
Sone ki Dhal  (Edition1st)

Sone ki Dhal (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
प्रस्तुत पुस्तक सोने की ढाल वैचारिक धरातल पर राहुल जी का एकदम नया प्रयोग है। हिन्दी के प्रारम्भिक काल में देवकीनन्दन खत्नी ने तिलस्मी और जासूसी उपन्यासों की बुनियाद डाली थी-यह उसी टूटी धारा को जोड़ने का एक सफल प्रयास है जो लेखक के बहु-आयामी कर्तृत्व को प्रकट करता है। राहुल जी ने विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है, किन्तु इस पुस्तक की विषय-सामग्री काल्पनिक और रहस्यभरी है। इसके पात्र कई देशों, यथा- भारत, अरब, रूस आदि के हैं लेकिन उनके तथ्य के प्रति समान सोच, ईमानदारी और विश्वास का भाव निहित है।
Soodkhor Ki Maut  (Edition1st)

Soodkhor Ki Maut (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
जुए की आमदनी से महरूम होकर कारी ने अब अपनी सारी शक्ति को सूदखोरी, कुरानफुरोशी तथा कर्जदारों और किरायेदारों के घर आश खाने में लगा दिया। जब वह बड़ा हुआ और पैसा भी उसके पास अधिक हो गया, तो उसने छोटे सूदखोरों का पीछा छोड़ दिया, क्योंकि उसमें उसका कुछ पैसा डूब जाता था। अब उसने बड़े-बड़े दुकानदारों और सौदागरों के साथ लेने-देन शुरू किया। बड़े बायों (सेठों) के यहाँ उसका पैसा बिलकुल नहीं डूबता था। अगर वह वैसा करना भी चाहें, तो भी दूसरे दिन जरूरत होने पर कारी इस्मत के पहिले पैसे को लौटाना जरूरी होता । उसके कहने के अनुसार जवानी के समय दो बायों के हाथ में दो बार पैसा डूबा था, लेकिन उसने उसके बदले में बिना पैसा दिये उनकी लड़कियों को अपनी बीबी बनाकर हिसाब अपना ठीक कर लिया। यह दोनों औरतें टोपी बुनना जानती थीं। आखिरी उमर तक दोनों उसी घर में रहीं। यह दोनों उन्हीं दिवालिया सौदागरों की लड़कियाँ थीं।
Adeena  (Edition1st)

Adeena (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
यात्रा का दिन आ गया। अदीना के फटे कपड़े भी सिल चुके थे। रास्ते के लिये कुछ रोटी और खाने की चीजें भी तैयार हो चुकी थी। वादे के अनुसार संगीन भी आ पहुँचा। इस दिन के लिये बीबी आइशा ने खास तौर से घी के साथ पुलाव पकाया था। उन्होंने मिलकर खाना खाया, खुर्जी और थैले को गधे पर लाद बीबी आइशा ने अदीना को अपनी गोद में दबा लिया। बेचारी के ताकत नहीं थी, कि कोई बात कहती। वह केवल अपनी आँखों से छः- छः पांत आँसू बहाने लगी। संगीन दरवाजे के बाहर गली में एक घंटा प्रतीक्षा करता रहा, किन्तु अदीना का कहीं पता नहीं था। इसलिये उसने आवाज़ दी "जल्दी कर। अगर देर हुई, तो हम आज रात को मंजिल पर न पहुँचेंगे और फरगाना जाने वाले कारवाँ का साथ न हो सकेगा।" ताशकंद की सड़कों पर बन्दूक और मशीनगन चलने की आवाज़ आ रही थी। लोग हर तरफ भाग रहे थे। दुकानें बन्द थीं। दरवाजे और खिड़कियाँ गोलियों के लगने से टूटी- फूटी और सूराखों से भरी थीं। शाह डरता काँपता, गलियों से बेरास्ते होकर, अपनी दुकान में पहुँचा। यह स्वाभाविक ही था, कि दूसरी दुकानों और हाटों की भाँति इस समय शाह मिर्जा का समावार-खाना भी बन्द होता। पीछे का दरवाजा खोल, उसने दुकान में आकर देखा, कि वहाँ 15-20 अपरिचित आदमी इकट्ठा होकर बैठे हैं। उनमें से हर एक बार-बार अपनी जगह से उठकर, हाल जानने के लिये वेदों और दरारों से बाहर सड़क की ओर देखता है। यह वह लोग थे, जिन्होंने गड़बड़ी शुरू होने के समय ही भाग कर इस दुकान में शरण ली थी।
Samyawad Hi Kyon  (Edition1st)

Samyawad Hi Kyon (Edition1st)

Rahul Sankrityayan

Prabhakar Prakashan
2024
nidottu
हमारे देश की गरीबी ऐसी नहीं है जिसका इलाज न हो। सभी साधन रहते भी हम बेबस हैं, क्योंकि हम उन साधनों का इस्तेमाल कर नहीं सकते। मनुष्य का श्रम ही तो धन है। भारत के पैंतीस करोड़ आदमियों में अठारह करोड़ आदमी तो अवश्य काम कर सकते हैं। आजकल उनमें से थोड़े तो धनी होने के कारण काम करने में अपनी हतक समझते हैं। यही नहीं, उनको अपने शरीर की देख-भाल, सेवा टहल के लिए भी दर्जनों आदमी चाहिए। वह स्वयं भी काहिल हैं और दूसरे के काम के भी चोर। लेकिन जो लोग काम कर सकते हैं, क्या उन सबको काम मिलता है? किसी पूँजीवादी देश में सबको काम मिल ही नहीं सकता। मिल-मालिकों और जमींदारों को एक परिमित संख्या में ही मजदूर चाहिए। राजा-महाराजों, सेठ साहूकारों के खिदमतगारों का काम उत्पादक-श्रम नहीं है, क्योंकि उनके काम से मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक कोई चीज उत्पन्न नहीं की जा सकती। आखिर श्रम और वेतन एक-दूसरे पर आश्रित चीजें हैं। जब श्रम खाने पहिनने, रहने की चीजों को पैदा करता है, तो श्रमिक को यह चीजें रुपये पैसे के संकेत से वेतन के रूप में मिलती हैं। जितनी ही जीवन की उपयोगी चीजें अधिक परिमाण में पैदा होंगी, उतनी ही वेतन में पराखदिली होगी, लेकिन पूँजीवाद तो सभी कामों को करता है नफ़े की दृष्टि से। नफे के रास्ते की कितनी ही रुकावटों को हम पहले कह आये हैं जिसके कारण पूँजीवाद राष्ट्र के सभी के श्रम को इस्तेमाल नहीं कर सकता। यही वजह है जो पूँजीवाद में श्रम का अपव्यय और नाश बहुत भारी परिमाण में होता है।
FUNNY-SIDE UP! (Edition3)

FUNNY-SIDE UP! (Edition3)

Rahul Sankrityayan

Ukiyoto Publishing
2023
nidottu
राहुल जी के साहित्य के विविध पक्षों को देखने से ज्ञात होता है कि उनकी पैठ न केवल प्राचीन नवीन भारतीय साहित्य में थी, अपितु तिब्बती, सिंहली, अंग्रेजी, चीनी, रूसी, जापानी आदि भाषाओं की जानकारी करते हुए सतत साहित्य को भी उन्होंने मथ डाला। राहुल जी जब जिसके सम्पर्क में गये, उसकी पूरी जानकारी हासिल की। जब वे साम्यवाद के क्षेत्र में गये, तो कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्तालिन आदि के राजनीतिक दर्शन की पूरी जानकारी प्राप्त की। यही कारण है कि उनके साहित्य में जनता, जनता का राज्य और मेहनतकश मजदूरों का स्वर प्रबल और प्रधान है।'जीने के लिए' के बाद यह मेरा दूसरा उपन्यास है। वह बीसवीं सदी ईसवी का है और यह ईसापूर्व 500 का। मैं मानव समाज की उषा से लेकर आज तक के विकास को बीस कहानियों (वोल्गा से गंगा) में लिखना चाहता था। उन कहानियों में एक इस समय (बुद्ध काल) की भी थी। जब लिखने का समय आया, तो मालूम हुआ कि सारी बातों को कहानी में नहीं लाया जा सकता; इसलिये 'सिंह सेनापति' उपन्यास के रूप में आपके सामने उपस्थित हो रहा है।'सिंह सेनापति' के समकालीन समाज को चित्रित करने में मैंने ऐतिहासिक कर्तव्य और औचित्य का पूरा ध्यान रखा है। साहित्य पालि, संस्कृत, तिब्बती में अधिकता से और जैन साहित्य में भी कुछ उस काल के गणों (प्रजातंत्रों) की सामग्री मिलती है। मैंने उसे इस्तेमाल करने की कोशिश की है। खान-पान, हास-विलास में यहाँ कितनी ही बातें आज बहुत भिन्न मिलेंगी, किन्तु वह भिन्नता पुराने साहित्य में लिखी मौजूद हैं।
Dimagi Gulami (?????? ??????)

Dimagi Gulami (?????? ??????)

Rahul Sankrityayan

diamond pocket books pvt ltd
2023
pokkari
लेखक के अनुसार 'दिमागी गुलामी' से तात्पर्य मानसिक दासता से है। ये मानसिक दासता प्रान्तवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद व राष्ट्रवाद के नाम पर मनुष्य के मन-मस्तिष्क को जकड़ लिया है। मनुष्य की सोच इन्हीं बातों पर टिकी है जिससे संकीर्णता की भावना ने अपना प्रभाव जमा लिया है। लेखक कहते हैं आज जिस जाति की सभ्यता जितनी पुरानी होती है उनके मानसिक बंधन भी उतने ही अधिक जटिल होते हैं। हमारी सभ्यता जितनी पुरानी है उतनी ही अधिक रुकावटें भी हैं। हमारी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक समस्याएं इतनी अधिक और जटिल हैं कि हम उनका कोई इलाज सोच ही नहीं सकते जब तक हम अपनी विचारधाराओं को बदलकर सोचने का प्रयत्न नहीं करते हैं। अपने प्राचीन काल के गर्व के कारण हम अपने भूत में इतने गहराई से बंधे हैं कि उनसे हमें ऊर्जा मिलती है। हम अपने पूर्वजों की धार्मिक बातों को आंख मूंदकर मान लेते हैं। आज समाज में धर्म-प्रचार पूर्ण रूप से नफे का रोजगार है अधिकांश लोग आज इसे अपने व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं। इसके साथ-साथ एक नया मत भी लगभग 50-60 वर्षों से चल रहा है। दुनिया भर में कई लोग भूत-प्रेत, जादू-मंत्र सबको विज्ञान से सिद्ध करने में लगे हैं।हिन्दुस्तान का इतिहास देश और काल के हिसाब से बहुत प्राचीन है उसी तरह इसमें पाई जाने वाली मान्यताएं, अंधविश्वास भी बहुत अधिक हैं। हमारे देश में विभिन्न महान ऋषि-मुनि हुए जिन पर हमें हमेशा अभिमान रहा है। कुछ गिने-चुने राजनेता जाति-पाति के मुद्दों को उठाते हैं नहीं तो प्रायः इन ऋषियों की कद्र कर गुणगान करते हैं। इसलिये राष्ट्रीयता के पथ पर चलने वालों को भी समझना चाहिये कि उन्हें देश के उत्पादन के लिये इन दीवारों को गिराना होगा।
Jeene ke Liye (???? ?? ???)

Jeene ke Liye (???? ?? ???)

Rahul Sankrityayan

diamond pocket books pvt ltd
2023
pokkari
जीने के लिए लेखक का पहला उपन्यास है जिसमे जीवन का संघर्ष आपको देखने को मिलेगा यह उपन्यास तब लिखा गया था जब लेखक छपरा जेल में ढाई महीने रहे तभी इस खूबसूरत उपन्यास का सृजन हो पाया राहुल सांस्कृत्यायन की खासियत यह है कि इनकी रचनाएँ असाधारण होती हैं कुछ भी विचार अपने धरातल में रहते हैं राहुल सांकृत्यायन जिनका साहित्य क्रांति की मसाल के समान है इनका साहित्य समकालीन की जरुरत है जहाँ दुनिया इतर-बितर है वही इनका साहित्य दुनिया को बचाए रखने का काम करता है मानव व्यवहार के साथ जीवन दर्शन से सराबोर होती हैं इनकी पुस्तकें। इनकी सभी कृतियों में यायावरी की परछाई देखने को मिल जाएगी लेकिन इस उपन्यास में बिलकुल जमीनी धरातल पर जीवन चलता है भाषा भी इसकी आपको बोझिल नही लगेगी आप तय गति में जीवन का उतर-चढ़ाव देखेंगे। इसमें जीने की सार्थक जमीन आप ढूढ़ लेंगे। आशा करते है यह पुस्तक आपको पसंद आयेगी।