हरीश दरवेश की ग़ज़लें न सिर्फ़ हिन्दी-ग़ज़ल का एक अहम पड़ाव हैं, बल्कि भारतीय ग़ज़ल-परम्परा की सम्भावनाओं का एक अहम मोड़ भी हैं। हरीश दरवेश ख़ुद को दुष्यन्त कुमार और अदम गोंडवी की परम्परा का ग़ज़लकार मानते हैं, लेकिन इन दोनों से सन्दर्फ लेते हुए इन्होंने ग़ज़ल के नये प्रसंगों की व्याख्याएँ की हैं। दुष्यन्त कुमार प्रतीकों और इशारों में बात करते हैं और अदम गोंडवी का स्वर बहुत लाउड है, लेकिन हरीश दरवेश इन दोनों से अलग एक व्यक्तिगत अनूभूति का स्वर लेकर आते हैं। प्रतीकों की रचना-व्यवस्था उर्दू-ग़ज़ल की विशेषता रही है और व्यक्तिगत अनुभूति की अभिव्यक्ति भी उर्दू-ग़ज़ल की आत्मा है। अदम जी का स्वर समकालीन हिन्दी-कवीता के अधिक निकट था, जिसका प्रभाव हरीश दरवेश की कुछ ग़ज़लों में दिखायी देता है। हरीश दरवेश ने व्यक्तिगत पीड़ा और आक्रोश का मिश्रण ग़ज़ल जैसी स्थापित विधा में इस प्रकार किया है कि न सिर्फ़ इनके प्रति आकर्षण बढ़ता है, बल्कि ग़ज़ल-विधा से प्यार करनेवालों को एक नवीन सुखद अनुभूति प्रदान करता है। प्रचलित भाषा-विधान से एकदम अलाहदा इनकी शैली एक अलग ही गुहाविरे को स्थापित करती है।