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Kirjailija

Surya Kumar Upadhyay

Kirjat ja teokset yhdessä paikassa: 3 kirjaa, julkaisuja vuosilta 2021-2024, suosituimpien joukossa Ab Pallavi Azad Thi. Vertaile teosten hintoja ja tarkista saatavuus suomalaisista kirjakaupoista.

3 kirjaa

Kirjojen julkaisuhaarukka 2021-2024.

Ab Pallavi Azad Thi

Ab Pallavi Azad Thi

Surya Kumar Upadhyay

Redgrab Books Pvt Ltd
2021
pokkari
इस किताब के ज़रिये लेखक ने ज़िन्दगी को क़रीब से देखने-समझने की कोशिश की है। शीर्षक कहानी 'अब पल्लवी आज़ाद थी' समाज में महिलाओं की अभिव्यक्ति की आज़ादी की अवधारणा को पुख्ता करती है। बात करें अगर व्यवहारिक या पारिवारिक संबंधों की तो इसे अपने नज़रिये से देखना नीरस काम हो सकता है लेकिन जब इन्हीं संबंधों को दुनिया के चश्मे से देखना हो तो सोच का दायरा और गूढ़ और रोमांचक हो जाता है। कहानी 'नागिन चाय' की बात करें तो भावनात्मक और भौतिकवादी दोनों ही तरह का नज़रिया रखने वालों के लिए इस कहानी को पढ़ना अनिवार्य सा लगेगा। कहानी ' पारो और चंन्द्रमुखी' अपने अंदर कहीं हास्य रस, रौद्र रस, श्रृंगार रस तो कहीं करूण रस और अद्भुत रस को बारीकी से समेटे हुए है। लाचार पति की बेबसी की अनुभूति लेनी हो या पति-पत्नी के बीच तीखी नोंक-झोक के तड़के का एहसास करना हो या फिर अल्हड़ प्यार के साथ-साथ शुद्ध देसी रोमांस के मिज़ाज का मज़ा लेना हो तो 'दिल उल्लू का पट्ठा' जैसी कहानी आपके अंदर सोई हुई रूमानियत को जगाने का काम करेगी और आपके दिल को रोमांचित भी करेगी। युवा पीढ़ी की प्यार के करिश्माई अनुभवों को भी इस कहानी संग्रह में ख़ास तवज्जो दी गई है। इश्क़ के लिए प्रेरित करती कहानियों के साथ 'लव ३६' जैसी कहानी महानगरों में पनपने वाले अतरंग विवाहेत्तर संबंधों के विलक्षण तरीक़ों से पाठकों को रूबरू कराएगी। इस कहानी संग्रह में शामिल कहानियों में महज़ अल्हड़ता ही नहीं छिपी है बल्कि 'एवरबेस्ट गिफ्ट' जैसी कहानी भावना प्रधान लोगों की आँखों को बार-बार भिगोने का काम करेगी।
Wo Phela Pyar

Wo Phela Pyar

Surya Kumar Upadhyay

Redgrab Books
2024
nidottu
उसने अपने ओठों के पास गुलाब रखकर मुझे इतराती नजरों से देखा और कहा, "माफी नहीं मिलेगी क्या? ...अभी भी नाराज हो। माफ नहीं करोगे तो जाओगे कहा? तुम्हारा असली गुलाब तो मैं ही हूँ। तुम सममुच गुस्से में बड़े खूबसूरत लग रहे थे। तुम तो कहते थे कि मैं डरपोक नहीं हूँ। लेकिन पुलिस को देखते ही पसीने छूटने लगे थे तुम्हारे। लगता है ब्रेक वाले झटके से बड़ा मेरा वाला झटका था।" मैंने झिझकते हुए कहा, "हाँ, ये झटका जो तुमने अभी-अभी मुझे दिया है उसे मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकूँगा। तुम्हें समझना वाकई मेरे बस की बात नहीं है। एकदम तिलस्म हो तिलस्म। बकलोली।" धाकड़ कहाँ चुप रहने वाली थी, उसका उत्तर तैयार था। "मैं भी इस ठंड भरी रात को कभी नहीं भूल पाऊँगी। पहले अपने चेहरे के पसीने को पोछो। तुम्हें दिसंबर की कड़क ठंड में भी पसीना निकलवा दिया मैंने। तो जनाब ये है वूमेन पावर धाकड़ की पावर, समझे " फिर हम दोनों गले लग कर जोर-जोर से हँसने लगे। मैंने धाकड़ से कहा, "चलो जल्दी करो वर्ना तुम्हारी DDLJ छूट जाएगी। तुम फिर मुझे कोसोगी।" मैंने बाइक स्टार्ट की और मैं जब तक उसे बैठने के लिए कहता वो लपक कर मेरी बाइक पर आसन जमा चुकी थी। इस बार वह चिपक कर मेरे साथ बाइक पर बैठी थी। बाइक रफ्तार पकड़ चुकी थी और सीधे जाकर मेरी बाइक सिनेमा हॉल पर रूकी।
Kaliganj- A Battle of Revenge

Kaliganj- A Battle of Revenge

Surya Kumar Upadhyay

Redgrab Books
2023
sidottu
वो खूबसूरत थी, दिलकश थी, जवान थी, होशियार थी। लेकिन उसके मंसूबे बेहद खतरनाक थे। उसकी गोरी चमड़ी के पीछे उसका काला चेहरा छिपा हुआ था। उसकी रग-रग में अय्यारी और मक्कारी थी। उसकी मदहोश कर देने वाली नजरों से जिसकी भी नजरें मिल जाती थी, वो उसका दिवाना बन जाता था। उसकी मासूमियत, उसकी जिद और होशियारी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी । वह एक नंबर की फरेब तवायफ थी। नाम चाँदनी था। इलाहाबाद के मीरगंज की भगोड़ी तवायफ चाँदनी ने पहले कालीगंज को अपना ठिकाना बनाया। इसके बाद अपने सौंदर्य और चातुर्य के बलबूते वह जाने कब केन्द्रीय राजनीति में छा गई, पता भी नहीं चला। चाँदनी के लिए कालीमंदिर की बहु से लेकर प्रदेश और केन्द्र की राजनीति में सिक्का जमाना इतना आसान काम भी नहीं था। लेकिन चाँदनी जितनी तपती गई, उतनी निखरती गई। कठिन बाधाओं को आसानी से पार करना उसकी हुनर का एक हिस्सा बन चुका था। चाँदनी जैसे-जैसे कठिन बाधाओं को पार करती गई, उसकी महत्वाकांक्षा और बलवती होती गई। कालीमंदिर को एक भव्य कोठे में तब्दील करने का सपना देखने वाली चाँदनी के भीतर साम, दाम, दंड, भेद और कूटनीति का अद्भुत तालमेल था। उसने अपनी महत्वाकांक्षा के बीच रोड़ा बनने वाली हर बाधा को रास्ते से हटा देने का फैसला किया था। लेकिन बड़े से बड़ा शातिर भी कभी-कभी अति आत्मविश्वास का शिकार हो जाता है और खुद अपने ही बुने जाल में फंस जाता है। चाँदनी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। कुशल रणनीतिकार चाँदनी खुद अपने कुचक्र के जाल में ऐसी फंसी कि उसकी ही साजिश ने उसे कालीमंदिर के अहाते में हमेशा के लिए दफन कर दिया। एक प्रचंड सोच रखने वाली तवायफ चाँदनी की मौत तो हो गई थी लेकिन उसके सपने अभी भी जिंदा थे। कालीगंज में जिस भव्य कोठे की परिकल्पना चाँदनी ने की थी,